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शनिवार, 1 अगस्त 2026

केवल न्याय के द्वारा

"हे यहोवा, तेरे न्याय के मार्ग में हम लोग तेरी बाट जोहते आए हैं; तेरे नाम के स्मरण की हमारे प्राणों में लालसा बनी रहती है। रात के समय मैं जी से तेरी लालसा करता हूँ, मेरी आत्मा यत्न के साथ तुझे ढूँढ़ती है। क्योंकि जब तेरे न्याय के काम पृथ्वी पर प्रगट होते हैं, तब जगत के रहनेवाले धार्मिकता को सीखते हैं।"
— यशायाह 26:8-9; 30:18 भी देखें

हम केवल न्याय के माध्यम से ही प्रभु, धार्मिकता, को जान सकते हैं!

केवल जब हम धार्मिक ठहराए जाते हैं, तभी हम "परमेश्‍वर के साथ मेल” रख सकते हैं, अर्थात् आत्मिक जीवन की निरंतर बाधाओं के बिना उसके साथ सामंजस्यपूर्ण और घनिष्ठ संबंध में जी सकते हैं।

परमेश्‍वर के सामने लागू होने वाली एकमात्र धार्मिकता परमेश्‍वर की ही धार्मिकता है, जिसे यीशु मसीह ने अपने जीवन में प्रकट किया है। हम इसे कभी भी खुद उत्पन्न नहीं कर सकते हैं, केवल विनम्र विश्वास में प्राप्त कर सकते हैं।

वह विश्वास हमारे अंदर कैसे पैदा हो सकता है?

केवल तभी जब हम जो कुछ भी हैं और जो कुछ भी हमारे अंदर है, उस पर परमेश्वर के न्याय से हमारी सारी आत्म-क्षमता और स्व-धार्मिकता तोड़ दिया गया है, ताकि हम अपने जीवन पर अपनी जिद्दी पकड़ को छोड़ने और इसे मसीह के लिए बदलने के लिए तैयार हों।

जब मसीह “टूटे और पिसे हुए हृदय” के सिंहासन पर बैठा होता है, तो परमेश्वर के आत्मा द्वारा न्यायोचित विश्वास वहाँ पैदा हो सकता है।

पत्थर के हृदय को अपनी अभिमानी आत्मा के साथ तोड़ना होगा, इससे पहले कि परमेश्वर का आत्मा हमारे अंदर प्रवेश करे

और यीशु मसीह की धार्मिकता को हमारी धार्मिकता बनाए, ताकि हम वह जीवन जी सकें जो परमेश्वर चाहता है कि हम जिएँ।

प्रभु, जो "ऊँचे पर और पवित्रस्थान में निवास करता" है, केवल "खेदित और नम्र” लोगों  के साथ रहता है (यश.57:15)।

क्या परमेश्वर के साथ एक गहरी और सच्ची संगति के लिए हमारी लालसा इतनी मजबूत है कि हम परमेश्वर को हमें उन न्यायों से गुजरने दे, जो हमें वहाँ पहुँचाने के लिए बिल्कुल आवश्यक हैं?

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