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शनिवार, 24 अक्टूबर 2026

सृष्टि की तड़प

"सृष्‍टि बड़ी आशाभरी दृष्‍टि से परमेश्‍वर के पुत्रों के प्रगट होने की बाट जोह रही है।"
— रोमियों 8:19

रोमियों 8 के मध्य में—एक ऐसा अध्याय जो नए जन्म के माध्यम से हमें प्राप्त आत्मा में जीवन से संबंधित है—पौलुस ये अद्भुत शब्द कहता है।

ठीक इससे पहले, उसने उस पीड़ा पर चर्चा की है जिसे हमें सहना पड़ता है ताकि हम उस महिमा में सहभागी बन सकें जो परमेश्वर ने अपने सभी संतानों के लिए तैयार की है: हमारे अंतिम रूपांतरण को हमारे जी उठे और महिमामय उद्धारकर्ता की समानता में।

पौलुस स्पष्ट करता है कि यीशु की पीड़ा, मृत्यु, पुनरुत्थान और महिमीकरण केवल मानवता तक ही सीमित नहीं है, बल्कि सारी सृष्टि को भी समाहित करता है।

पतन ने विनाशकारी, विकृत करने वाली और घातक शक्तियों से मानवों, पशुओं, पौधों और स्वयं पदार्थ को भी प्रभावित कर दिया है। परिणामस्वरूप, संपूर्ण सृष्टि — परमेश्वर की संतानों सहित —प्र सव की पीड़ा में कराहती और तड़पती है, अपने छुटकारे की तीव्र लालसा के साथ, और "एक नए आकाश और नई पृथ्वी जिनमें धार्मिकता वास करेगी" की प्रतीक्षा करती है।

एक दिन, सारी सृष्टि परमेश्वर की महिमा से प्रकाशमान होगी। “तब भेड़िया भेड़ के बच्‍चे के संग रहा करेगा, और चीता बकरी के बच्‍चे के साथ बैठा करेगा, और बछड़ा और जवान सिंह और पाला–पोसा हुआ बैल तीनों इकट्ठे रहेंगे, और एक छोटा लड़का उनकी अगुवाई करेगा। मेरे सारे पवित्र पर्वत पर न तो कोई दु:ख देगा और न हानि करेगा; क्योंकि पृथ्वी यहोवा के ज्ञान से ऐसी भर जाएगी जैसा जल समुद्र में भरा रहता है।” इस प्रकार यशायाह भविष्यवाणी करता है।

और भजन संहिता में हम पढ़ते हैं: ”आकाश आनन्द करे, और पृथ्वी मगन हो; समुद्र और उसमें की सब वस्तुएँ गरज उठें; मैदान और जो कुछ उस में है, वह प्रफुल्‍लित हो; उसी समय वन के सारे वृक्ष जयजयकार करेंगे”, जब प्रभु पृथ्वी का न्याय करने और सारी सृष्टि से सभी बुराइयों—सभी विनाशकारी शक्तियों—को दूर करने आएगा।

सारी सृष्टि के छुटकारे की कुंजी आप और मैं में है — हम में जो परमेश्वर के आत्मा से नये सिरे से जन्मे हैं। हर छोटा-सा फूल, आपके पैरों तले की घास, आपके पड़ोसी का कुत्ता, जंगल का बाघ — सब पुकार रहे हैं, हमें प्रेरित कर रहे हैं कि हम अपने छुटकारे के लक्ष्य तक पहुँचने में आने वाली हर बाधा को पार करें, चाहे कोई भी कीमत चुकानी पड़े।

यीशु ने सब कुछ दे दिया—अपने शरीर की हर बूंद खून की कीमत चुकाकर—ताकि आप और मैं अपनी गुलामी और निरर्थक जीवन से मुक्त हो सकें। अब, बाकी सृष्टि की मुक्ति और महिमा के लिए हमें एक कीमत चुकानी होगी।

पौलुस इस तरह कहता है: ”मैं समझता हूँ कि इस समय के दु:ख और क्लेश उस महिमा के सामने, जो हम पर प्रगट होनेवाली है, कुछ भी नहीं हैं।”

क्या आप इससे सहमत हैं?

रोमियों 8:18-30 का पूरा अंश क्यों नहीं पढ़ते और सृष्टि की उस लालसा से खुद को अभिभूत क्यों नहीं होने देते!

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