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संवेदनशीलता और आज्ञाकारिता
"अत: जैसा पवित्र आत्मा कहता है, ‘यदि आज तुम उसका शब्द सुनो, तो अपने दिलों को कठोर मत करो।'"
इब्रानियों के अध्याय तीन और चार में दिल का उल्लेख छह बार किया गया है।
इन अध्यायों में आध्यात्मिक जीवन के कुछ सबसे बड़े रहस्य शब्दों प्रकट होते हैं: पवित्र आत्मा के माध्यम से परमेश्वर की आवाज़ के प्रति निरंतर संवेदनशीलता, और जो कुछ भी वह कहता है, उसके प्रति तत्काल, विनम्र आज्ञाकारिता, उस पर बच्चों जैसी विश्वास और भरोसा।
परमेश्वर हमें अपनी पूर्णता और विश्राम में लाना चाहता है, लेकिन हठ, सुनने और आज्ञा मानने से इनकार करना, आध्यात्मिक जीवन की पूर्णता में, इन अध्यायों वर्णित "विश्राम" में, प्रवेश करने में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है।
यही कारण था कि मूसा के अधीन मिस्र से बाहर निकले इस्राएली कभी भी पूर्णता के वादा किए गए देश में प्रवेश नहीं कर पाए।
इसी कारण से बहुत से लोग जो मसीह का अनुसरण करना शुरू कर चुके हैं, वे कभी भी आत्मा में जीवन की वादा की गई पूर्णता में प्रवेश नहीं कर पाते।
दिल आध्यात्मिक जीवन का केंद्र है, और उसी में जीवंत विश्वास पैदा होना चाहिए।
असंवेदनशील, कठोर हृदय के विकास का कारण बताने के लिए दो बहुत ही महत्वपूर्ण शब्दों का उपयोग किया गया है: ये
शब्द "अवज्ञा - आज्ञा न मानना" और "अविश्वास"हैं।
साथ में वे उस विश्वास को नष्ट कर देते हैं जो विश्राम में प्रवेश करने के लिए आवश्यक है।
अवज्ञा के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले शब्द का अर्थ है 'खुद को राजी करने से इनकार करना, विश्वास और आज्ञाकारिता को रोककर आज्ञा न मानना'। दूसरे शब्दों में, यह लापरवाही है, या परमेश्वर के वचनों को सुनने से इनकार करना है, जब तक हृदय में विश्वास न जगे, एक ऐसा विश्वास जो आज्ञाकारिता का परिणाम होता है।
यह दर्शाता है कि आज्ञाकारिता और विश्वास कितने निकट से संबंधित हैं।
अविश्वास शब्द का अर्थ है ‘परमेश्वर में विश्वास और भरोसे की कमी', जिसे "जीवते परमेश्वर से दूर हटा ले जाने वाले एक बुरे और अविश्वासी हृदय" के रूप में दर्शाया गया है।
इसलिए, हम देखते हैं कि परमेश्वर को हमारे दिलों में सभी जिद्दी अवज्ञा को तोड़ने की अनुमति देना और फिर आत्मा की आवाज़ के प्रति संवेदनशीलता विकसित करना कितना महत्वपूर्ण है, ताकि हमारे दिलों में आज्ञाकारी और भरोसेमंद विश्वास पैदा हो सके।
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